1. Z1: मेरी कुर्सी के नीचे का जोकर
पहली बार मेरे कारण कमरा चुप हुआ था क्योंकि किसी को मेरी कुर्सी के नीचे जोकर मिला था। दूसरी बार इसलिए हुआ क्योंकि मुझे बेईमान कहने वाले आदमी के नाम के सामने चालीस दंड अंक लिखने थे।
तब मैं बत्तीस साल का था। मेरा नाम हारून अंसारी चौदह महीने दूसरों की बातों में घूमता रहा, फिर ऐसी स्कोरशीट पर लौटा जिसे मैं रखना चाहता था।
दोनों चुप्पियाँ एक जैसी नहीं थीं। पहली तथ्य जाँचे जाने से पहले आई थी। दूसरी मेरी आखिरी घोषणा का हर पत्ता जाँचे जाने के बाद।
जोकर कभी मेरा नहीं था। बाद में कैमरे की रिकॉर्डिंग में दिखा कि उपकरण ले जाते समय आयोजक की बदलने वाली गड्डी से फिसला था। समिति ने रिपोर्ट सुधारी और पुष्टि की कि मैंने अतिरिक्त पत्ता नहीं डाला था।
जिस फाइनल की बात करने वाला हूँ, उससे महीनों पहले यह हो चुका था। जीत ने मुझे निर्दोष नहीं बनाया। अभ्यास में हारते समय भी निर्दोष था। क्लब के बाहर चाय की दुकान से बचते समय भी। माँ पूछती थी कि पड़ोसी वही कटी तस्वीर क्यों दिखाते हैं, तब भी।
जीत ने दूसरा काम किया। तस्वीर का आनंद लेने वाले आदमी को सही परिणाम दर्ज होने तक बैठाए रखा।
उसका नाम देव था। मजबूत रमी खिलाड़ी था। यह महत्वपूर्ण है। वे महीने किसी मूर्ख को हराने की तैयारी में नहीं लगाए थे जो मेरे डरना बंद करते ही बिखर जाएगा। सामने अच्छे फैसले करने वाला विरोधी था। मुझे उसी को खेल में हराना था।
ऐप लिंक और मौजूदा ऑफ़र की जानकारी चाहिए? नीचे अपनी पसंद की कम्युनिटी चुनें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
2. सुधार से क्या ठीक नहीं हुआ
जोकर देव को नहीं मिला था। दर्शक को मिला था। अंपायर गड्डी गिनता, उससे पहले देव ने कारण बता दिया।
“अब समझ आया कि इसके हाथ कैसे सुधरते हैं।”
रिकॉर्डिंग करते किसी ने वाक्य दोहराया। आधिकारिक जाँच चल ही रही थी जब वीडियो मेरी मरम्मत की दुकान तक पहुँचा। ग्राहक ने मजाक किया कि उपकरण छोड़ने से पहले पेंच गिन लेने चाहिए।
मैंने रसीद दी, कुछ नहीं कहा। उसके जाने के बाद बीस मिनट दुकान बंद की और काउंटर के पीछे फर्श पर बैठ गया।
सही रिपोर्ट बाद में आई। पूरी कैमरा रिकॉर्डिंग, उपकरण की गड़बड़ी और शुरुआती भ्रम के लिए माफी थी। जिन्होंने वीडियो भेजा था, सबको भेजी। कुछ ने जवाब दिया। कुछ बोले कि वे तो केवल सवाल पूछ रहे थे।
देव ने क्लब में कहा कि घटना दुर्भाग्यपूर्ण थी। यह नहीं कहा कि उसका आरोप झूठा था।
छोटे चचेरे भाई ने अभ्यास में आना बंद कर दिया। मेरा नाम मजाक बनते सुनना बुरा लगता था। मैंने कहा कि समझता हूँ। फिर घर जाकर रंग धुँधले होने तक अकेले पत्ते बाँटता रहा।
पहला उपयोगी निर्णय था उसे अभ्यास कहना बंद करना। परिचित वस्तु से खुद को दंड दे रहा था। गड्डी एक सप्ताह रख दी। लौटकर ऐसे समीक्षा समूह में जुड़ा जहाँ फैसला केवल उस समय दिखाई देने वाले पत्तों से समझाना होता था।
कमरा ज्यादा सख्त था। अधिक दयालु भी। वहाँ गलत चाल को गलत कहा जाता था, लेकिन उससे व्यक्ति के चरित्र की कहानी नहीं बनाई जाती थी।
3. वे समूह जिन्हें मैं बार-बार बिगाड़ता था
मेरी मुख्य कमजोरी बेईमानी नहीं थी। अधूरी संरचनाओं के साथ अधीरता थी। दो अच्छे दिखने वाले सेट बनते दिखाई देते तो दोनों बहुत देर तक रखता। दूसरा जरूरी क्रम बाद की बात बना रहता। फिर उम्मीद करता कि जोकर उस हाथ को ठीक कर देगा जिसकी मूल व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया।
समूह ने बिना ड्रॉ किए तेरह पत्तों के उदाहरण लगवाए। कौन-से पत्ते शुद्ध क्रम हैं? कौन दूसरे क्रम में बदल सकते हैं? कौन-सी जोड़ियाँ मदद करने के बजाय जगह के लिए लड़ रही हैं?
एक अभ्यास में पूरा प्राकृतिक स्पेड क्रम, जुड़े दो क्लब और दो बड़ी जोड़ियाँ थीं। दोनों जोड़ियाँ बचाना चाहता था। साथी ने अगले तीन संभावित ड्रॉ बदले और हर स्थिति में पूछा कि क्या छोड़ूँगा।
कई रास्ते कठिन हो गए क्योंकि दिशा बदलने की जगह ही नहीं छोड़ी थी।
बड़ी जोड़ियाँ अलग-अलग समय पर तोड़कर वही अभ्यास दोहराया। कभी एक बचाना सही था। कभी दोनों छोड़नी पड़ीं। लक्ष्य तेरह वैध पत्तों के वास्तविक रास्ते पहचानना था, लगभग पूरे समूहों की संख्या पर खुश होना नहीं।
समीक्षा में घोषणा का क्रम बोलकर भी जाँचा: कम से कम दो सीक्वेंस, एक शुद्ध; बाकी पत्ते वैध क्रम या सेट में; सेट में एक अंक के अलग सूट; अतिरिक्त पत्ता छोड़ने के बाद तेरह।
असली खेल में चुपचाप जाँचता। किसी को भाषण नहीं चाहिए था। मुझे ऐसी आदत चाहिए थी जो कमरे की निगाह आने पर भी बनी रहे। कठिन समय में हाथ अपने आप सही जगह नहीं जाते। पहले सैकड़ों बार उन्हें सही प्रश्न पूछना सिखाना पड़ता है।
4. आठ डील, कोई छोटा रास्ता नहीं
फाइनल में चार खिलाड़ियों की एक मेज पर आठ डील थीं। सही घोषणा पर उस डील के शून्य अंक। बाकी दंड लिखित नियमों के अनुसार। आठवीं के बाद सबसे कम कुल वाला विजेता।
देव पहले क्वालिफाई हुआ। नेहा और इकबाल बाकी स्थानों पर आए। मैंने क्वालिफायर में कम दंड वाली हार से अपना कुल निकटतम प्रतिद्वंद्वी से थोड़ा आगे रखा।
देव ने परिणाम देखकर कहा कि मैं सावधान हो गया हूँ।
“प्रारूप पढ़ने जितना,” मैंने कहा।
पहली बार उसे तीखा उत्तर दिया था। तुरंत पछताया क्योंकि मिली खुशी और बोलने को उकसा रही थी। नेहा ने पूछा कि ड्रॉ शुरू करें क्या। हमने किया।
पहली डील देव की थी। मुझे चौबीस अंक लगे। दूसरी नेहा ने घोषित की। मुझे सोलह और देव को बारह मिले।
दो डील बाद मेरे चालीस, देव के बारह।
गर्दन में परिचित गर्मी चढ़ी। बाहर की बातें कल्पना में सुनने लगा: सही रिपोर्ट ने प्रतिष्ठा बचाई, मगर शायद खेल फिर भी अच्छा नहीं।
विचार अप्रासंगिक और खतरनाक था। रिपोर्ट घटना का प्रमाण थी। स्कोर दो डील का। दोनों मिलाने से तीसरी डील खेलने में मदद नहीं मिलती।
अगले तेरह पत्ते समूहों में लगाए। अधूरी संभावनाओं के बीच जगह छोड़ी। उस क्रम से शुरू किया जिसे वास्तव में सुरक्षित रख सकता था। पिछली घटना को जीत का कारण बनाना भी उतना ही गलत होता जितना उसे हर हार की व्याख्या बना देना।
5. घोषणा मिली, बढ़त नहीं
तीसरी डील मैं जीता। प्राकृतिक ड्रॉ ने दूसरा क्रम पूरा किया। पूरा हाथ जाँचकर घोषणा की। देव को बीस अंक मिले। मेरा कुल चालीस रहा। उसका बत्तीस हुआ। मेरे पास घोषणा थी, बढ़त नहीं।
चौथी में देव पहले पूरा हुआ। मैंने लचीला समूह तब भी पकड़े रखा जब उसका लचीलापन समाप्त हो चुका था। अट्ठाईस अंक जुड़ गए।
अड़सठ-बत्तीस। वह छत्तीस आगे था।
उस डील के बाद निर्धारित विराम था। खेल क्षेत्र के बाहर मैचों के बीच इस्तेमाल होने वाली छोटी कॉपी खोली। दूसरों के अज्ञात पत्ते नहीं लिखे। समाप्त हाथ में समीक्षा योग्य जानकारी खुल चुकी थी। अपने चुनाव के बारे में एक वाक्य लिखा: “दूसरी योजना खत्म थी। मैं उसकी कीमत देता रहा।”
लौटने से पहले कॉपी बंद की।
पाँचवीं डील नेहा जीती। मुझे आठ, देव को छह अंक लगे। अंतर ज्यादा नहीं बदला, लेकिन जरूरी तरीके से हाथ सुधरा था। बेकार जोड़ी महँगी होने से पहले छोड़ दी थी।
छिहत्तर-अड़तीस।
इकबाल अब तक हमारे बीच की बातों में शांत था। उसने कहा कि चारों के कुल पढ़े जाएँ। सही था। यह निजी विवाद नहीं था जिसमें दो लोगों को मेज भरने के लिए बुलाया गया हो।
स्कोरर ने सभी के अंक पढ़े। नेहा और इकबाल की चैंपियन बनने की अपनी संभावना थी। उनके खिलाफ भी खेलना था। अपनी चोट को इतना बड़ा नहीं कर सकता था कि बाकी खिलाड़ियों का पूरा प्रयास उसके पीछे गायब हो जाए।
6. वह अफवाह जिसे मैंने उधार नहीं लिया
बाद के अनुमति वाले विराम में गलियारे के पास दर्शक किसी दूसरे आयोजन से नेहा पर आरोप दोहराने लगा। बोला कि उसने कभी पत्ते खुलने से पहले जान लिया था कि दूसरे के पास क्या है।
मैंने पूछा कि क्या आधिकारिक निष्कर्ष इसका समर्थन करता है। उसने कहा कि सबने सुना है।
इन शब्दों को कहने वाले को कितना आराम मिल सकता है, मैं ठीक जानता था।
“तो अफवाह है,” मैंने कहा। “यहाँ नियम की समस्या देखी है तो अंपायर को वही बताइए जो वास्तव में देखा।”
उसने पूछा कि विरोधी का बचाव क्यों कर रहा हूँ। उसके पत्तों का बचाव नहीं कर रहा था। देखी बात और चोट पहुँचाने के लिए बनाई कहानी का अंतर बचा रहा था।
नेहा ने बातचीत का अंत सुना। एक बार धन्यवाद कहा। अगली डील में ऐसा खुला पत्ता उठाया जिससे मुझे अपनी पहली योजना की उपयोगिता फिर सोचना पड़ी।
उसका पूरा हाथ नहीं जानता था। उठाया पत्ता और अपना हाथ जानता था। उसी प्रमाण पर दिशा बदली।
छठी डील मेरी सही घोषणा पर समाप्त हुई। देव को अठारह अंक मिले।
मेरा कुल छिहत्तर रहा। उसका छप्पन हुआ। बीस पीछे, दो डील बाकी।
नेहा ने अपना दंड स्वीकार किया। आसान खेल देकर एहसान नहीं लौटाया। मुझे अच्छा लगा। मैंने उससे अपने लौटने की कहानी का आभारी छोटा किरदार बनने को नहीं कहा था। मेज वास्तविक चाहिए थी। वह जितनी कठिन बनी रहती, अंतिम परिणाम का अर्थ उतना ही साफ रहता।
नई गतिविधियों और ऐप अपडेट के लिए अपना पसंदीदा चैनल देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
7. बत्तीस अंक पीछे
सातवीं डील देव जीता। मैंने दंड बारह तक रखा। फिर भी स्कोर कठोर था: हारून 88, देव 56। एक डील बाकी। मैं बत्तीस पीछे।
खुद से वापसी का वादा करने का जिम्मेदार तरीका नहीं था। अच्छी योजना के बाद भी हार सकता था। दूसरा पहले पूरा हो सकता था या देव का दंड छोटा रह सकता था।
फिर भी पत्ते बँटने से पहले हार मानने का कारण नहीं था।
देव ने अपना कुल दो बार देखा। बढ़त का लालच समझता था: निश्चितता का इंतजार करके बचाओ, या जल्दी समाप्त करने के लिए आक्रामक हो जाओ। नियम किसी भी प्रतिक्रिया को जरूरी नहीं बनाते। वह अपना तरीका चुनेगा। मुझे उसका वास्तविक खेल हराना होगा।
आखिरी हाथ में जुड़े पत्ते थे, लेकिन आकर्षक संभावनाएँ जरूरत से ज्यादा। एक बड़ा अकेला पत्ता था जो सही अंक आने पर सेट में जुड़ सकता था। साल की शुरुआत में केवल मौका खोना बुरा लगने के कारण उसे बचाता।
अब उसकी तुलना बनते क्रमों से की। उन पत्तों का रास्ता रखा जो पहले से साथ काम कर रहे थे।
कमरा बहुत शांत हुआ। इसलिए नहीं कि किसी को परिणाम पता था। चार खिलाड़ी ऐसे फैसले कर रहे थे जो जल्द दिखाई देने वाले थे। आगे कोई डील नहीं थी जिसमें गलती की व्याख्या छिपाई जा सके।
मैंने कुर्सी के नीचे नहीं देखा। पहली बार किसी फाइनल में वह विचार आया ही नहीं। मेरी पूरी चिंता मेज के ऊपर थी, जहाँ इस समय वास्तव में निर्णय लिया जा सकता था।
8. मेज पर मैंने क्या रखा
आखिरी डील के अंत में मेरे पास स्पेड के 4, 5, 6, 7 थे। हार्ट के 9, 10 और जैक थे। क्लब, डायमंड और हार्ट की रानियाँ थीं। क्लब के 2 और 3 थे। डायमंड का जैक था।
तेरह पत्ते। क्लब को एक पत्ता चाहिए था। डायमंड का जैक किसी उपयोगी समूह के बाहर था।
बंद ढेर से क्लब का 4 मिला। पूरा रास्ता मिल गया, लेकिन ड्रॉ अकेला घोषणा नहीं था। अतिरिक्त पत्ता छोड़ना और व्यवस्था जाँचना बाकी था। मैंने डायमंड का जैक छोड़ा।
स्पेड के चार लगातार पत्ते। हार्ट के तीन लगातार। अलग सूट की तीन रानियाँ। क्लब के तीन लगातार। तेरह पत्ते वैध समूहों में। जरूरी क्रम मौजूद और प्राकृतिक क्रम सुरक्षित।
घोषणा की और समूहों के बीच जगह रखकर खोले।
अंपायर ने हर समूह देखा। मैं इंतजार करता रहा। देव ने क्लब देखे, फिर रानियाँ, फिर गिनती। अपना हाथ अभी सामने बंद रखा था।
घोषणा स्वीकार हुई।
नेहा और इकबाल ने गिनती के लिए खोले। फिर देव ने पत्ते रखे। अधूरे समूहों का नियम अनुसार चालीस दंड था।
गिनती के समय मैं मुस्कराया नहीं। महीनों से कल्पना की अभिव्यक्ति लाकर अपना ध्यान तोड़ने से डर रहा था।
स्कोरर ने अंतिम अंक लिखे: हारून 88, देव 96, नेहा 104, इकबाल 110।
पहली प्रतिक्रिया अपनी आठ प्रविष्टियाँ फिर जोड़ना थी। जिस सही जाँच की कमी ने पुरानी घटना बिगाड़ी थी, जीत के क्षण में भी उसी की जरूरत थी।
9. हस्ताक्षर
चौबीस, सोलह, शून्य, अट्ठाईस, आठ, शून्य, बारह, शून्य। अट्ठासी। देव की पंक्ति शून्य, बारह, बीस, शून्य, छह, अठारह, शून्य, चालीस थी। छियानवे। मैं आठ अंक से जीता था।
देव ने अंपायर की अनुमति से आखिरी हाथ फिर जाँचा। अनुरोध को आरोप नहीं समझा। सही जाँच ही तब गायब थी जब उसने तय किया था कि कुर्सी के नीचे जोकर का क्या अर्थ है।
गलती नहीं थी। उसने परिणाम पर हस्ताक्षर किए।
पीछे तालियाँ शुरू हुईं। चचेरा भाई आया था। आखिरी डील के दौरान पहुँचा और पीछे खड़ा रहा। उसे देखा तो उसने हाथ उठाया। उस इशारे ने भीतर की ऐसी गाँठ खोली जहाँ अकेला स्कोर नहीं पहुँचा था।
देव ने कहा, “क्लब मिल गया।”
“हाँ। क्लब का रास्ता रखने के बाद।”
ड्रॉ चाहिए था। उससे पहले वे फैसले भी चाहिए थे जिन्होंने उसे उपयोगी बनाया। छोटे दंड भी जिन्होंने वापसी संभव रखी। एक हिस्सा दूसरे को रद्द नहीं करता था।
लगा कि वह पुरानी घटना के बारे में कुछ जोड़ेगा। इंतजार किया।
“उस दिन जो कहा था, गलत था,” उसने कहा।
मैंने सिर हिलाया। माफी गैरजरूरी नहीं बताई। चौदह महीने से जरूरी थी।
फिर नेहा और इकबाल की तरफ मुड़ा। फाइनल की समीक्षा करनी थी। जिस आदमी को हराना चाहता था, उसके बगल में बैठने से अधिक काम उन्होंने किया था। उनकी सही चालें भी इस परिणाम की पूरी कहानी में होनी चाहिए थीं।
10. अगली प्रविष्टि में मेरा नाम
माँ ने ट्रॉफी की तस्वीर माँगी। आधिकारिक परिणाम भी भेजा। फोन किया क्योंकि नाम साफ पढ़ सकती थी, लेकिन अंक समझाने वाला चाहिए था। आठों डील बताईं, चौथी की अपनी खराब चाल भी। कहानी अधिक अच्छी बनवाने के लिए बीच में नहीं टोका।
अगली शाम दुकान बंद होने के बाद चचेरा भाई आया। काम की मेज साफ की, औजार हटाए और अभ्यास हाथ लगाया। वह आखिरी ड्रॉ दोहराना चाहता था।
मैंने चौथी डील से शुरू करने को कहा। उसने कराहने की आवाज निकाली। मैं उस दिन पहली बार यह देखे बिना हँसा कि कौन सुन सकता है।
उस मोड़ पर काम किया जहाँ मेरा लचीला समूह उपयोगी रहना बंद हुआ था। उसने एक विकल्प निकाला जो मुझसे छूटा था। मैंने उत्तर खोजा जिससे उसका पहला सुझाव कम आकर्षक हुआ। हाथ केवल अपने ऊपर विश्वास करने की आसान सीख बनने से इनकार कर रहा था। अच्छा था। सीखने योग्य खेल बना रहना चाहिए था।
एक सप्ताह बाद अगली प्रतियोगिता का फॉर्म भरा। नाम में हारून अंसारी लिखा। सुधरी रिपोर्ट साथ नहीं लगाई। आयोजक के पास जहाँ होनी चाहिए थी, वहाँ थी—सुलझ चुकी घटना के रिकॉर्ड में।
तैयारी की कॉपी में दूसरी बात लिखी: “समूह जाँचो। कीमत गिनो। केवल वही बताओ जो जानते हो।”
फिर तेरह पत्ते बाँटे और शुरू किया। मेरी पहचान अब भी वही थी। फर्क यह था कि अगली शाम किस सवाल पर काम करना है, वह फिर मैं तय कर रहा था।
आगे जानना चाहते हैं? ऐप की जानकारी और साझा ऑफ़र की शर्तें चैनल पर देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप