1. 9IPL कहानी: पुराने बोर्ड के अलग किनारे
मनोज ने पीहू को देखने से पहले कैरम के फ्रेम पर छोटा निशान पहचान लिया। वह तब पड़ा था जब दोनों बोर्ड अपनी साझी छपाई की दुकान में ला रहे थे। दुकान ग्यारह महीने पहले बंद हो चुकी थी। बोर्ड बच गया था। कोई तय नहीं कर पाया था कि किसके पास रहे, इसलिए सामुदायिक हॉल को दे दिया गया।
अब वही उनकी नई टीमों के बीच था।
मनोज छियालीस का था, पीहू अड़तीस की। कभी व्यापार, डबल्स की साझेदारी और बिना पूछे दूसरे की चाय जानने की आदत साझा थी। अब वे अलग दरवाजों से आए और एक-दूसरे को छोड़कर सबको नमस्कार किया।
मनोज का साथी केशव सामने बैठा। पीहू के सामने अंजु थी। काल्पनिक अंतर-क्लब चुनौती में अधिकतम तीन गेम का डबल्स मैच था। अधिकारी ने सीटें जाँचीं और खेलने का क्रम बताया। सक्रिय खेल में बोर्ड के पार सलाह दिए बिना हर खिलाड़ी को अपनी बारी सँभालनी थी।
पीहू ने फ्रेम का निशान छुआ, फिर हाथ हटा लिया।
“अब भी कठिन गोटी किसी और के लिए छोड़ते हो?”
मनोज ने केशव को देखा। उनतीस साल का नया साथी पुराने संबंध की इतनी कहानियाँ सुन चुका था कि आधी पर भरोसा नहीं करता था।
“देखते हैं किसे निकालनी पड़ती है,” मनोज ने कहा।
अधिकारी ने शांति माँगी। पीहू ने शुरुआती स्ट्रोक तैयार की। कमरे को पुराना इतिहास पता था। बोर्ड पर दोनों रंगों की नौ-नौ गोटियाँ और रानी थीं। इतिहास के लिए कोई अलग खाना नहीं था।
ऐप लिंक और मौजूदा ऑफ़र की जानकारी चाहिए? नीचे अपनी पसंद की कम्युनिटी चुनें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
2. साथ खेला आखिरी मैच
पुरानी डबल्स साझेदारी दुकान का आखिरी शटर गिरने से पहले समाप्त हो गई थी। लीग का एक मैच उन्हें जीतना चाहिए था। मनोज कठिन शुरुआत चूका और पीहू को वापसी करनी पड़ी। उसने स्थिति सुधारी, फिर निर्णायक मौके पर रानी कवर नहीं कर पाई। लाल गोटी केंद्र में लौटी। विरोधियों ने नियंत्रण लेकर मैच जीता।
मनोज ने पूरी टीम के सामने कहा कि उसने उसकी मेहनत पर पानी फेर दिया।
पीहू देखती रह गई। “तुम्हारी मेहनत?”
उसे पीहू की आखिरी चूक याद थी। जिन शॉट के कारण वापसी जरूरी हुई, वे याद से गायब थे। बहस दुकान तक गई, जहाँ थकान और घटते ऑर्डर पहले ही हर निर्णय कठिन बना रहे थे। किराए की अवधि खत्म हुई, व्यापार बंद हुआ और बोर्ड भाड़े की गाड़ी में हॉल गया। दोनों एक-दूसरे की विदाई बैठक में नहीं आए।
मनोज केशव के क्लब में गया। पीहू अंजु के क्लब में। अलग होने के शुरुआती महीने शानदार नहीं थे। वह अब भी खराब छोड़ी स्थिति से साथी के बचा लेने की उम्मीद करता। वह नए साथी पर भरोसा करने के बजाय हर बोर्ड अकेले पूरा करना चाहती थी।
दुकान के बाकी कागज मनोज के पलंग के नीचे डिब्बे में रहे। पीहू ने लेने का दिन पूछा। उसने व्यस्त होने का जवाब दिया, फिर पीहू ने पूछना छोड़ा तो खुद को उपेक्षित समझा।
नए क्लब में उसका एक और महत्वाकांक्षी कट छूटा। केशव ने पूछा, “अंदर नहीं जाता तो कैसी स्थिति छोड़ने की योजना थी?”
3. साथी के अपने हाथ थे
केशव पीहू की तरह नहीं खेलता था। स्ट्राइक करने का हाथ, पसंदीदा लाइन और गति अलग थी। मनोज उसके फैसलों को डरपोक कहता, जबकि वास्तव में वे उसे अपरिचित लगते थे। पहले अभ्यास मैच में उसने वह आसान गोटी ले ली जिसे केशव बाद में उपयोग कर सकता था। फिर कठिन कोण छोड़कर बोर्ड को दोष दिया।
खेल के बाद केशव ने स्थिति दोबारा सजाई। मनोज को सामने की कुर्सी पर बैठाकर वही बची गोटी खेलने को कहा। वहाँ से साफ रास्ता दिखा। दोनों किनारों से कठिनाई एक जैसी नहीं थी।
वे खेल से पहले लक्ष्य का क्रम समझने और बाद में फैसले दोहराने लगे। सक्रिय खेल में हाथ और आवाज अपने पास रखते। अपनी बारी आने पर नए बोर्ड को हर खिलाड़ी खुद समझता। साथी अवसर बचा सकता था; बीच के विरोधी उसे वैसा ही छोड़ेंगे, इसकी गारंटी नहीं थी।
मनोज पूछना सीखने लगा कि शॉट सफल होने के अलावा क्या बदलेगा। कोई रास्ता खुलेगा या बंद होगा? क्या अगली आसान स्ट्रोक खत्म हो जाएगी? चूका तो अगले खिलाड़ी को सीधी समाप्ति मिल जाएगी?
केशव भी सीख रहा था। उसकी सुरक्षित खेलने की पसंद कभी कठिन मगर जरूरी अवसर लेने से रोकती थी। मनोज ने केवल सबसे आसान संपर्क चुनने के बजाय उन कठिन अवसरों का अभ्यास कराया।
सुधार सीधा नहीं था। एक शाम दोनों उसी गोटी को दूसरे के लिए छोड़ते रहे और हारे। अगले सप्ताह उन्होंने अंदाजा लगाना कम किया कि दूसरा क्या चाहता है। बोर्ड में जो वास्तव में संभव था, उस पर भरोसा बढ़ाया।
4. पीहू भी बदल चुकी थी
हॉल के दूसरी तरफ पीहू और अंजु की अलग साझेदारी बनी थी। इकतालीस साल की अंजु शांत खिलाड़ी थी। वह पीहू को हर उस बोर्ड के लिए माफी नहीं माँगने देती जो उसकी बारी में पूरा नहीं होता। बाद के विश्लेषण में अपनी चूकों को उसी सटीकता से बताती जिससे पीहू की।
मनोज और केशव के खिलाफ पहला गेम उस मेहनत का परिणाम दिखाता था। साफ क्रम मिलता तो पीहू हमला करती। बची गोटियाँ दूसरा कोण माँगतीं तो अंजु धीमी पड़ती। कोई साबित नहीं करना चाहती थी कि साथी का पूरा काम अकेले कर सकती है।
मनोज शुरुआती लय खो बैठा। उसे पीहू का पुराना तेज अगला शॉट अपेक्षित था। अब बेहतर होने पर वह कठिन स्थिति अंजु के लिए छोड़ देती थी। अंजु अवसर पूरा करती। केशव ने दो साफ समाप्तियों से जवाब दिया, फिर भी उनकी जोड़ी पीछे रही।
पहला गेम महिलाओं ने पच्चीस-सत्रह से जीता।
पीहू उठी और फ्रेम का पुराना निशान देखा। मनोज टिप्पणी की प्रतीक्षा करता रहा। उसने अंजु से पानी के लिए पूछा।
उसका छोटा-सा दूसरी तरफ मुड़ना ताने से ज्यादा चुभा। मनोज मैच को पुरानी साथी से बातचीत मान रहा था। वह अपनी वर्तमान साथी के साथ डबल्स खेल रही थी।
विराम में केशव ने स्कोर दिया। “चार खिलाड़ी हैं,” उसने कहा।
मनोज ने अंक पढ़े और अंजु को देखा। कमरे की सबसे पुरानी बहस ने विरोधी टीम का आधा हिस्सा उसकी नजर से छिपा दिया था।
5. शीट पर सत्रह अंक बने रहे
दूसरे गेम में मनोज ने कठिन गोटी की जिम्मेदारी जल्दी ली। शानदार पॉकेट का प्रयास नहीं किया। नियंत्रित संपर्क से उसे पट्टी से दूर लाया और सरल गोटी उपलब्ध छोड़ी। शॉट में अंक नहीं मिला, लेकिन बाकी बोर्ड बिखेरे बिना स्थिति सुधरी।
अंजु ने समझदारी से जवाब देकर दो काली निकालीं। फिर केशव ने नई स्थिति देखी और ऐसा रास्ता पाया जो मनोज की तरफ से नहीं था। उसकी समाप्ति से जोड़ी गेम में लौटी।
पीहू ने पुरानी कमजोरी परखा। ऐसी स्थिति छोड़ी जिसमें तुरंत रानी पर हमला आकर्षक लगता, मगर कवर कठिन होता। मनोज ने प्रलोभन पहचाना, क्योंकि महीनों उसी गलती की सफाई देता रहा था। पहले साधारण सफेद ली और रानी का बेहतर अवसर आने दिया।
जब लाल गोटी व्यावहारिक हुई, केशव ने निकाली और सही कवर किया। जोड़ी ने कई बोर्ड में बढ़त बनाई। दूसरा गेम पच्चीस-उन्नीस से उनके पक्ष में बंद हुआ।
एक-एक गेम।
मनोज ने स्कोर पर हस्ताक्षर किए। ऊपर लिखा शुरुआती सत्रह वैसा ही रहा। पीहू ने शीट देखी। उसने यह भाषण नहीं दिया कि धैर्य सीख गया है। वह उसके फैसले देख चुकी थी।
विराम में केशव ने लंबा पानी पिया और उँगलियाँ खोलीं। मनोज ने पूछा कि कुर्सी की ऊँचाई ठीक है क्या। उस शाम पहली बार उसने अपने वास्तविक साथी से कोई सवाल पुराने साथी का जिक्र किए बिना पूछा था। केशव ने सिर हिलाया और अगला गेम शुरू होने से पहले दोनों चुपचाप बैठे रहे।
6. बोर्ड पुराने मालिकाने को नहीं मानता था
निर्णायक गेम में पीहू का बेहतरीन खेल शुरू हुआ। भीड़ वाली शुरुआत जल्दी समझी और बारी जाने से पहले तीन उपयोगी गोटियाँ निकालीं। अंजु ने दबाव जारी रखा। मनोज की जोड़ी पीछे गई, फिर केशव ने अपनी तरफ से संकरी सीधी लाइन पूरी की और वापसी हुई।
हर उपयोगी समाप्ति में एक से ज्यादा लोगों का योगदान था। एक खिलाड़ी की निकाली हुई जगह में साथी बहुत बाद गोटी डाल सकता था, जब विरोधी रास्ते फिर बदल चुके हों। मनोज बोर्ड को व्यक्तिगत दावों की कतार के बजाय बदलती साझा समस्या समझने लगा।
बीच के महत्वपूर्ण बोर्ड में वह ऐसी सफेद चूका जिससे उनकी जोड़ी को नियंत्रण मिलता। पहली इच्छा केशव की ओर देखकर सफाई देने की हुई। उसने नजर बोर्ड पर रखी। सक्रिय बारी अब विरोधियों की थी।
पीहू ने चूक का फायदा लिया, लेकिन सारी बची स्ट्रोक पूरी नहीं कर पाई। केशव की बारी आई तो उसने खुद रास्ता निकाला। एक कठिन सफेद निकाली और अगली चूक गया। वापसी अधूरी थी, फिर भी मूल्यवान।
बोर्ड के बाद मनोज ने कहा, “मेरा पहला संपर्क ज्यादा मोटा था।”
केशव ने सिर हिलाया। “मैं दूसरी में जल्दी कर गया।”
दो गलतियाँ सही लोगों के हिस्से गईं। किसी को दूसरे की पूरी विफलता ढोनी नहीं पड़ी। अगला बोर्ड सजने से पहले वे बैठ गए। मैच इतना करीब था कि हर नियंत्रित स्ट्रोक का महत्व बना हुआ था।
नई गतिविधियों और ऐप अपडेट के लिए अपना पसंदीदा चैनल देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
7. इक्कीस बनाम बाईस
स्कोर इक्कीस-बाईस पहुँचा। महिलाएँ एक अंक आगे थीं। एक बोर्ड मैच बदल सकता था, लेकिन उसका मूल्य बची गोटियों और सुरक्षित रानी पर निर्भर था। अधिकारी ने अगली सजावट से पहले कुल दोहराया। दोनों जोड़ियों ने सुना।
मनोज की तरफ सफेद, पीहू की तरफ काली थीं। शुरुआत में केशव ने रानी निकाली और जरूरी अगली स्ट्रोक में अपनी सफेद से कवर किया। लाल उनकी तरफ सुरक्षित थी। इक्कीस अंक पर इस बोर्ड को जीतने पर रानी का बोनस अभी मिल सकता था।
पीहू ने मजबूत क्रम से जवाब दिया। दो कोनों से काली गोटियाँ गायब हुईं। फिर अंजु ने उनकी बची काली केवल एक कर दी। आखिरी काली कठिन थी, लेकिन कठिन का मतलब दूसरी टीम के लिए सुरक्षित नहीं था। दोनों में से कोई उसे निकाल देता तो मनोज और केशव बोर्ड खो देते।
उनकी दो सफेद अलग तरह की स्थितियों में थीं। एक मनोज को उपलब्ध थी। दूसरी उसकी तरफ से कठिन, लेकिन केशव की ओर से साफ हो सकती थी। मनोज के भीतर पूरा बोर्ड खुद खत्म कर देने की पुरानी इच्छा उठी।
सामने केशव स्थिर बैठा था। कोई संकेत नहीं दिया। नियम और अभ्यास दोनों मनोज से अपना निर्णय चाहते थे।
पीहू ने स्ट्राइकर की ओर जाता उसका हाथ देखा। उस हाथ का उतावला रूप वह हॉल में सबसे अधिक जानती थी। इस बार हाथ पूरी स्थिति देखने भर को ठहरा।
8. आखिरी स्ट्रोक केशव की थी
मनोज ने उपलब्ध सफेद साफ निकाली। एक बची। उसके किनारे से मौजूदा कोण बहुत कम गलती की गुंजाइश वाला जोरदार प्रयास माँग रहा था। इतनी गति की चूक उसकी गोटी बिगाड़ने के साथ आखिरी काली का रास्ता भी खोल सकती थी।
उसने नियंत्रित संपर्क चुना। सफेद अधिक खुले रास्ते में गई, मगर गिरी नहीं। बारी खत्म हुई। उसने संभावना सुधारी थी, परिणाम पक्का नहीं किया था। अगले विरोधी के पास बोर्ड पहले समाप्त करने का वास्तविक मौका था।
अंजु ने काली देर तक देखी। सीधी लाइन कठिन होने से पट्टी से लौटने वाला रास्ता चुना। संपर्क बहुत करीब था। काली पॉकेट के मुँह तक पहुँची, किनारा छुआ और बाहर रह गई।
केशव की बारी आई और सफेद अब भी उपलब्ध थी। मनोज ने हाथ मेज के नीचे रखे। सामने की कुर्सी से लाइन समझ आ रही थी, लेकिन ठीक संपर्क केशव को अपनी जगह से तय करना था।
केशव ने नियम के अनुरूप स्ट्राइक की स्थिति जाँची और सीधा कट साधा। पीहू आगे झुकी। अंजु उस काली को देख रही थी जिसे लगभग खत्म कर दिया था। स्ट्राइकर सफेद से लगा। गोटी साफ रास्ता पार करके पॉकेट में गई।
गिरने के बाद ही केशव पीछे हुआ।
एक पल मनोज बोल नहीं पाया। अंतिम स्ट्रोक उसकी नहीं थी। सीने में आती जीत फिर भी छोटी नहीं लगी। उसने अपने साथी को देखा और पूरे कमरे को साफ देखने दिया कि उसकी नजर किस पर है।
9. चार अंक और दो हाथ
विरोधी की एक काली बची थी। मनोज और केशव बोर्ड जीते थे और रानी पहले ही सुरक्षित कर चुके थे। शुरुआत के इक्कीस में बची गोटी का एक अंक और रानी के तीन जोड़कर पच्चीस हुए।
निर्णायक गेम पच्चीस-बाईस समाप्त हुआ। जोड़ी ने दो गेम बनाम एक से मैच जीता—सत्रह-पच्चीस, पच्चीस-उन्नीस, पच्चीस-बाईस।
केशव पहले खड़ा हुआ। मनोज ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों के बीच ऊपर किया। घोषक विजेता की बात लेने मनोज की ओर मुड़ा तो उसने माइक्रोफोन सामने की ओर किया।
“आखिरी स्ट्रोक उसने की। उससे पूछिए क्या देखा।”
केशव ने लाइन समझाई। उससे पहले की स्थिति सुधारने वाली स्ट्रोक को बेकार नहीं बताया। उसका योगदान बताया, फिर अपना समायोजन। श्रेय बोर्ड के दोनों तरफ गया और किसी का आकार कम नहीं हुआ।
पीहू सुनती रही। निराशा से चेहरा बंद था, लेकिन हाथ मिलाकर तुरंत नहीं हटाई।
“तुम्हें पहले ऐसा अंत किसी और के लिए छोड़ना बुरा लगता था।”
“मुझे मानना बुरा लगता था कि दूसरा बेहतर देख रहा है।”
अंजु भी आई और बताया कि काली कितनी करीब पहुँची थी। केशव ने बाद में उसे फिर सजाने को कहा। चार खिलाड़ी पुराने बोर्ड के आसपास चार लोगों के फैसले समझ रहे थे। दुकान बंद होने के बाद पहली बार मनोज ने पीहू को ऐसी बात पर हँसते सुना जिसका उद्देश्य उसे चुभाना नहीं था।
10. पलंग के नीचे का डिब्बा
हॉल शांत होने पर उन्होंने आखिरी बोर्ड फिर बनाया। अंजु को पट्टी से लौटने वाले प्रयास का थोड़ा अलग संपर्क मिला। केशव पहली पुनरावृत्ति में अपना विजयी कट चूका और दूसरी में बनाया। विश्लेषण ने अंतिम स्ट्रोक की वास्तविक कठिनाई दिखाई।
दूसरे गोटियाँ रख रहे थे, तब मनोज ने पीहू से कहा कि दुकान के बाकी कागज उसके पास हैं। पूछा कि शनिवार सुबह ठीक रहेगा क्या। उसने दस बजे पुराने शटर के बाहर मिलने को कहा। साथ में फाइल के डिब्बे की चाबियाँ भी लाने को कहा।
शनिवार को मनोज नौ बजकर पचास मिनट पर पहुँचा। सब सामान एक कार्टन में क्रम से था। पीहू ने फोल्डर देखे, गायब रही चाबी पाई और ढक्कन बंद किया। बोर्ड बाहर ले जाने में मदद करने वाले लोगों के बारे में थोड़ी बात हुई। लंबे समय बाद वे व्यावहारिक बातचीत बिना असफल व्यापार की पूरी बहस दोबारा खोले समाप्त कर पाए।
जाने से पहले उसने कहा कि अंजु अगले महीने फिर डबल्स खेलना चाहती है।
“केशव से पूछूँगा,” मनोज ने कहा।
पीहू ने उस जवाब पर सिर हिलाया। उसके वर्तमान साथी को अब बाद में याद नहीं किया जा रहा था।
शाम के अभ्यास में केशव कठिन आखिरी सफेद पहले ही सजा चुका था। मनोज सामने बैठा। फ्रेम का पुराना निशान देखा, फिर साथी के सामने का कोण।
खेल शुरू होने से पहले उसने कहा, “इस बार वह रूप दिखाओ जिसमें चूके थे।”
केशव मुसकराया और गोटी दोबारा रखी।
आगे जानना चाहते हैं? ऐप की जानकारी और साझा ऑफ़र की शर्तें चैनल पर देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप