SVIP 777 — आखिरी बस इंतजार नहीं करेगी
SVIP 777

SVIP 777 — आखिरी बस इंतजार नहीं करेगी

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

नौ बजकर चौबीस मिनट पर रोहन ने कॉपी बैग में रखी। आखिरी बस नौ चालीस पर स्टॉप से निकलती थी। वहाँ पैदल पहुँचने में बारह मिनट लगते थे। विक्रम ने अभ्यास कक्ष के…

नौ बजकर चौबीस मिनट पर रोहन ने कॉपी बैग में रखी।

आखिरी बस नौ चालीस पर स्टॉप से निकलती थी। वहाँ पैदल पहुँचने में बारह मिनट लगते थे।

विक्रम ने अभ्यास कक्ष के दरवाजे के ऊपर घड़ी देखी।

“बैठो। तुम्हारी गलतियों की समीक्षा बाकी है।”

दूसरे खिलाड़ी सामान समेटने लगे।

रोहन ने दरवाजे की तरफ इशारा किया।

“जुड़ते समय बताया था। मुझे बस—”

“सबकी जिंदगी है।”

विक्रम ने सहज स्वर में कहा। इससे मुश्किल बढ़ गई। चीखने पर आपत्ति कर सकता था। कोई साफ तमाशा होता तो शायद कोई बीच में आता।

रोहन बैठ गया।

समीक्षा सत्रह मिनट चली।

छह मिनट उस हाथ पर गए जिसमें वह खेला ही नहीं था।

विक्रम ने आखिर अंक वाला फोल्डर बंद किया तो रोहन दौड़ा।

स्टॉप पर एक आदमी जूस की दुकान का शटर गिरा रहा था।

“चली गई।”

रोहन घुटनों पर हाथ रखकर झुक गया।

आदमी को बताने की जरूरत नहीं थी कि कौन सी बस।

* * *

वह रिंग रोड के बाहर रहता था, जहाँ वास्तव में खत्म होने से पहले शहर कई बार खत्म होता लगता था।

सत्ताईस साल का रोहन औद्योगिक क्षेत्र के पास पैकेजिंग इकाई में काम करता था। माँ घर में ब्लाउज की अंदरूनी सिलाई करती थीं।

दोनों मिलकर किराया, राशन और वह अनियमित खर्च सँभालते जो हर बार आपातकाल का चेहरा लेकर आता था।

वह वयस्क होने के आसपास से इंडियन रमी खेलता था। पहले रिश्तेदारों के साथ, फिर वयस्क अभ्यास समूहों में। खेल में जरूरी एकाग्रता पसंद थी। एक घंटे के लिए सामने की समस्या की सीमाएँ देख सकता था।

शहर का क्लब बेहतर अभ्यास और टीम के जरिए प्रतियोगिताओं तक जाने का रास्ता देता था।

वह आखिरी बस की पहुँच के मुश्किल छोर पर भी था।

जुड़ने से पहले रोहन ने यात्रा की सीमा समझाई। कप्तान विक्रम ने कहा कि सत्र आम तौर पर नौ पंद्रह तक समाप्त होते हैं।

“बहुत समय है।”

तीन सप्ताह सच रहा।

फिर रोहन सवाल पूछने लगा।

किसी खिलाड़ी के देर से आने को अनदेखा क्यों करते हैं और दूसरे के अभ्यास अंक काटते हैं? कप्तान के दोस्तों को मेज चुनने का पहला मौका क्यों मिलता है? सत्र के बाद रिकॉर्ड साझा हो सकता है क्या?

विक्रम ने उसे गंभीर युवक कहा।

धीरे-धीरे वह प्रशंसा जैसा नहीं लगा।

* * *

पहली रात बस छूटी तो रोहन बंद जूस की दुकान के पास खड़ा घर की सवारी का खर्च देखता रहा।

दो दिन के खाने के लिए रखी रकम से ज्यादा था।

दो चालकों से बात की। उसके पास जितना था, उसमें कोई नहीं माना।

माँ का फोन आया।

उसने कहा कि बस देर से है।

यह झूठ सुनना आसान था, बजाय इसके कि माँ बिजली के बिल वाले लिफाफे से पैसे भेजने को कहें।

पास के गोदाम के चौकीदार ने छज्जे के नीचे बैठने दिया। सुबह मजदूरों की पहली सेवा शुरू होने तक वहीं रहा।

ठीक से नींद नहीं आई।

छह बजे घर पहुँचा। मुँह धोया। काम के कपड़े पहने।

माँ चूल्हे के पास थीं।

जूते देखे। फिर आँखें।

“अगली बार बताना।”

उसने सिर हिलाया।

इकाई में कार्टन का कोड गलत पढ़ा और आधा ढेर फिर करना पड़ा। पर्यवेक्षक चिढ़ा, लेकिन अन्याय नहीं किया। आगे काम से पहले थोड़ा रुकने को कहा।

दोपहर तक विक्रम ने अभ्यास अंक डाल दिए।

रोहन के नाम के पास सत्र पूरा किए बिना चले जाने की कटौती थी।

* * *

रोहन ने संदेश भेजा।

समीक्षा पूरी होने तक रुका था। मेरी बस छूट गई।

विक्रम ने समूह में उत्तर दिया।

प्रतिबद्धता सार्वजनिक परिवहन से नहीं मापी जाती।

कई लोगों ने हँसने वाले चिन्ह लगाए।

एक ने बस का चित्र भेजा।

रोहन छोटी पीली गाड़ी देखता रहा। वह मजाक नहीं रही। उन सारी चीजों की सही तस्वीर बन गई जिनके बारे में बाकी लोगों को सोचना नहीं पड़ता था।

लंबा जवाब लिखा, फिर मिटा दिया।

शाम को विक्रम को अलग फोन किया।

“दोबारा ऐसा नहीं कर सकता।”

“तो समय सँभालो।”

“सत्र तय समय से आगे गया।”

“अलग सुविधा चाहिए?”

“तय खत्म होने के समय जाना चाहता हूँ।”

विक्रम ने कहा कि गंभीर खिलाड़ी घड़ी नहीं देखते।

रोहन ने रसोई की घड़ी देखी। बीस मिनट में माँ को ग्राहक की सिलाई लौटानी थी। अगली पाली सात बजे थी।

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जिंदगी की हर गंभीर चीज में समय देखना पड़ता था।

समझ नहीं आया कि उस आदमी को कैसे समझाए जो इसे कमजोरी कह रहा था।

* * *

दूसरी बार बस इतनी स्पष्ट वजह से छूटी कि रोहन बहाना बनाकर नहीं समझा सकता था।

नौ बारह पर विक्रम ने कहा कि मुख्य काम पूरा है।

अपनी गाड़ियों वाले दो खिलाड़ी जाने दिए गए।

नौ अठारह पर रोहन उठा तो कप्तान ने उपस्थिति जाँच और छोटी व्यक्तिगत समीक्षा घोषित की।

तीन नाम तक रोहन रुका।

फिर विक्रम ने फोन उठा लिया।

नौ इकतीस पर रोहन ने बैग लिया।

विक्रम ने अंक वाली शीट आगे की।

“अभी गए तो अगले टीम आयोजन में जगह नहीं मिलेगी।”

रोहन ने बाकी खिलाड़ियों को देखा।

एक फोन देखने लगा। दूसरा मेज घूरता रहा। तीसरे ने छोटी माफी जैसी मुस्कान दी। वह मुस्कान जिससे लोग चाहते हैं कि समझ जाओ, वे कुछ क्यों नहीं कर रहे।

रोहन रुका।

बस फिर छूट गई।

इस बार गोदाम के छज्जे के नीचे नहीं बैठा।

बंद स्टॉप पर क्लब का बैज उतारकर जेब में रखा।

फिर माँ को फोन किया और सच बताया।

* * *

स्टॉप की नीची दीवार पर बैठी महिला ने फोन खत्म होने पर पूछा, “विक्रम?”

रोहन ने देखा।

उसने परिचित क्लब के निशान वाला कपड़े का बैग उठाया। अंदर की तरफ उलटा किया हुआ था।

“मैं जाती थी।”

नाम फराह था। इकतीस साल की थी। जाँच केंद्र के स्वागत कक्ष पर काम करती थी। रोहन से तीन स्टॉप पहले रहती थी।

उस शाम दूसरे अभ्यास समूह से आई थी। सत्र देर से खत्म हुआ तो बस छूटी। उसने कहा कि वह समूह सामान्यतः देर होने पर माफी माँगता है।

मुख्य सड़क की ओर जाती साझा सवारी मिली। रोहन के पास तय किराए में कमी थी।

वह फोन रखने लगा।

फराह ने बाकी दे दिया।

“साठ रुपये। लौटा देना।”

उसे अच्छा लगा कि उसने रकम बता दी।

रास्ते में बताया कि विक्रम का क्लब तब छोड़ा जब अभ्यास मिलना इस पर निर्भर होने लगा कि वह उसकी मर्जी के समय मौजूद हो सकती है या नहीं।

“सिर्फ इसलिए रुकना जरूरी नहीं कि छोड़ने पर वह तुम्हें गैरजिम्मेदार कहेगा।”

रोहन सड़क देखता रहा।

इंतजार था कि क्लब के भीतर कोई यह कहेगा।

बात बाहर के बस स्टॉप पर मिली।

* * *

अगली दोपहर साठ रुपये लौटा दिए।

फिर क्लब कार्यालय को लिखा।

तय समय, देर की समीक्षा और जुर्माने की प्रविष्टियाँ बताईं। अपना उपस्थिति रिकॉर्ड सही करने को कहा। टीम कार्यक्रम से हटने की सूचना दी।

कार्यालय ने संदेश मिलने की पुष्टि की। जाँच के बाद जाने वाली एक गलत प्रविष्टि हटाई। पूरा कार्यक्रम उसके लिए दोबारा नहीं बनाया।

विक्रम का अलग उत्तर आया।

कुछ लोग सुधार से ज्यादा बहाने पसंद करते हैं।

रोहन ने बहस नहीं की।

कई शाम काम से सीधे घर आया और लगा कि हार मान ली है।

खाली समय तुरंत शांत नहीं हुआ। आठ तीस पर क्लब की मेजें याद आतीं। नौ पंद्रह पर लगता कि बाकी लोग उसके बिना बेहतर हो रहे होंगे।

माँ ने सामने खाना रखा।

“खेलना छोड़ दिया?”

“वहाँ जाना छोड़ा है।”

माँ ने सिर हिलाया।

“दोनों अलग सुनते हैं।”

रोहन ने अभी तय नहीं किया था कि सच में अलग हैं क्या।

अगली सुबह फराह ने पूछा कि बस बदलने वाली जगह के पास एक कमरा देखने चलेगा?

* * *

कमरा छोटे सामुदायिक संघ का था।

सादा, गरम और सप्ताह में दो शाम उपलब्ध। मेजें एक जैसी नहीं थीं। एक ट्यूबलाइट भिनभिनाती थी। किराया इतना कम था कि बाँट सकें।

फराह के दो और वयस्क परिचित तैयार थे। रोहन का सहकर्मी भी कभी अभ्यास करता था।

समूह का नाम चुनने से पहले खत्म होने का समय चुना।

आठ पचास।

आठ चालीस पर ऐसा नया काम शुरू नहीं करेंगे जो देर तक चले। अधूरी समीक्षा लिखकर या अगले सत्र में होगी।

तय परिवहन पकड़ने पर किसी की उपस्थिति नहीं कटेगी।

संभव हो तो सप्ताहांत में पहले का समय रखेंगे।

पहली शाम रोहन घड़ी देखता रहा।

फराह ने देखा।

“समय है।”

उसने सिर हिलाया। फिर देखा।

आठ उनचास पर एक खिलाड़ी जटिल बात समझाने लगा। फराह ने पूछा कि अगली बार के लिए लिख सकता है क्या।

वह मान गया।

पत्ते रख दिए।

नौ सत्रह पर रोहन बस में बैग गोद में लिए बैठा था।

कई स्टॉप तक विश्वास नहीं हुआ कि माफी माँगने को कुछ बाकी नहीं है।

घर में माँ ने पूछा कि अभ्यास रद्द हो गया क्या।

“नहीं। खत्म हो गया।”

उन्होंने तवा आँच से हटाया और हाथ धोने को कहा। खाना खाते समय एक ग्राहक से आस्तीन को लेकर हुई बहस बताई। इस बार रोहन नींद से लड़ते हुए सुनने का नाटक नहीं कर रहा था। सच में सुन रहा था।

फिर अपनी एक गलती बताई। माँ खेल इतना नहीं समझती थीं कि सलाह दे सकें। इतना समझती थीं कि वह बात करना चाहता है।

रोहन ने प्लेटें उठाने में मदद की।

अगली सुबह अलार्म फिर अलार्म जैसा लगा। पिछली रात की सजा जैसा नहीं।

* * *

नई व्यवस्था अपने आप शानदार नहीं हो गई।

कितना रिकॉर्ड लिखना चाहिए, इस पर रोहन और फराह असहमत हुए। एक सदस्य दो सत्र बिना बताए नहीं आया। बरसात वाली शाम ट्यूबलाइट बंद हो गई।

उन्होंने हर बात अलग सँभाली।

देर के उत्तर से यह साबित नहीं होता था कि महत्वाकांक्षा नहीं है। अलग राय का मतलब कोई कमरे का मालिक नहीं था।

संघ की अनुमति के बाद रोहन दूसरी ट्यूब लाया। फराह ने सरल कार्यक्रम बनाया। गैरहाजिर सदस्य ने माफी माँगी और कहा कि सप्ताहांत उसके लिए बेहतर है।

समूह ने बदलाव किया।

खेल धीरे और असमान तरीके से सुधरा।

कभी रोहन खुश लौटता। कभी पूरी बस यात्रा एक गलती सोचता रहता, जब तक फराह नहीं पूछती कि बात करनी है या खिड़की देखनी है।

दोनों जवाब मान्य थे।

एक शाम फराह बैग के सारे खाने में किराए का छोटा पर्स खोज रही थी।

रोहन ने साठ रुपये निकाले।

“जरूरत के लिए रखे हैं।”

वह हँसी।

“इसे पीढ़ियों चलने वाली परंपरा मत बनाना।”

रोहन ने पैसे दिए। फराह ने लिए। अगले अभ्यास में लौटा दिए।

किसी ने उस छोटी मदद से भविष्य के सारे फैसले नहीं खरीद लिए।

* * *

सर्दियों में स्वतंत्र चयन आयोजन के प्रवेश खुले।

प्रकाशित कार्यक्रम सामान्य यात्रा के हिसाब से समय पर समाप्त होता था। दोनों व्यक्तिगत खिलाड़ी के रूप में जुड़े। किसी क्लब कप्तान की अनुमति नहीं चाहिए थी।

शर्तें, शुल्क और देर होने पर प्रक्रिया देखी। पैसे देने से पहले रोहन ने यात्रा का छोटा वैकल्पिक इंतजाम भी किया।

फराह ने भी किया।

इस तैयारी से खेल में निराशा की संभावना खत्म नहीं हुई।

एक चयन सत्र रोहन बुरी तरह हारा। कंधे कसकर प्रतीक्षा वाले हिस्से में लौटा। सबका समय बरबाद करने वाला वाक्य तैयार था।

फराह ने खाने का डिब्बा दिया।

“किसका समय?”

उसने देखा।

“अपना सत्र खेला है। अब देखो क्या हुआ।”

उसने समीक्षा की।

चयन दौरों के अंत तक दोनों आगे पहुँच गए।

उस शाम माँ की सिलाई खत्म होने से पहले घर आ गया।

माँ ने परिणाम का संदेश देखा, फिर घड़ी।

“तो ये लोग प्रतियोगिता करवाकर खत्म भी कर सकते हैं?”

रोहन हँसा।

कर सकते थे।

* * *

अंतिम आयोजन में विक्रम मिला।

क्लब की साफ, चमकती कमीज पहने था। दो खिलाड़ी पीछे थे।

एक पल रोहन को लगा कि समय से पहले स्कूल से निकलते पकड़ा गया है।

विक्रम ने फराह को देखा, फिर उसे।

“बस वाली साझेदारी?”

फराह ने रोहन से पूछा कि पंजीकरण मेज मिल गई क्या।

उसने दिशा दिखाई।

दोनों चल पड़े।

पीछे विक्रम बोला कि कुछ लोग छोटे इंतजामों से आगे नहीं बढ़ सकते।

रोहन ने सुना।

स्वयंसेवक ने उसका नाम पूछा और पंजीकरण पूरा होने की पुष्टि की। वह भी सुना।

उसने चुना कि किस बातचीत का उत्तर देना है।

पहला दिन लंबा था। सामान्य देरी हुई। जरूरत पर आयोजकों ने संशोधित समय बताए।

रोहन को इंतजार पसंद नहीं था। जानकारी होने से सँभाल सकता था।

फराह अंतिम सत्र में पहुँची।

वह भी पहुँचा।

विक्रम नहीं पहुँचा।

अंक सूची से पता चला। कोई नाटकीय घोषणा नहीं हुई। दुनिया ने उसके आनंद के लिए अलग क्षण नहीं बनाया।

उसे अपनी अगली मेज खोजनी थी।

* * *

अंतिम सत्र में फराह सामने थी।

जिस महिला ने एक रात किराया पूरा किया था, वह अब ऐसी प्रतिद्वंद्वी थी जो उससे आगे रह सकती थी।

रोहन को अजीब तरह से अच्छा लगा।

दोस्ती के लिए किसी को नरम नहीं खेलना था।

नियमों के भीतर खेले। ध्यान दिया। अपने फैसले किए। एक हिस्से में फराह उसे उसकी पसंद से ज्यादा अच्छी तरह समझ गई। बाद में वह सँभला। कुछ समय दूसरा खिलाड़ी आगे रहा।

छूटी बसों से अच्छा परिणाम निश्चित नहीं होता था।

अंत की तरफ गलती हुई और पुराना डर आया। कोई कहेगा कि यही प्रमाण है, विक्रम के क्लब में रहना चाहिए था।

उसने घड़ी देखी।

भागने के लिए नहीं।

यह देखने के लिए कि सामने का वास्तविक काम करने में कितना समय है।

फिर मेज पर ध्यान दिया।

अंतिम अंक जाँचने में कई मिनट लगे।

फराह तीसरे स्थान पर रही।

रोहन पहला था।

हाथ कहाँ रखे, समझने से पहले उसने आगे बढ़कर हाथ मिला लिया।

“अब चाय खरीद सकते हो।”

“साठ रुपये की?”

“मुश्किल आदमी मत बनो।”

* * *

पुरस्कार कार्यक्रम संशोधित अनुमान से भी देर तक चला।

नौ दस पर रोहन ने समन्वयक से पूछा कि बाकी औपचारिकताएँ कितनी देर लेंगी।

उसने जाँचा।

पुरस्कार की तस्वीर तुरंत हो सकती थी। विस्तृत साक्षात्कार वैकल्पिक था। दूसरे दिन रखा जा सकता था।

रोहन ने तस्वीर स्वीकार की। साक्षात्कार रविवार को तय किया।

किसी ने अंक नहीं काटे।

किसी ने नहीं कहा कि आभार दिखाने के लिए आखिरी बस छोड़नी होगी।

तस्वीर के बाद क्लब का परिचित दरवाजे पर मिला।

“विक्रम तुम्हारे साथ फोटो चाहता है।”

रोहन ने पुरस्कार वाली जगह देखी। कप्तान प्रायोजक बोर्ड के पास किसी से बात कर रहा था।

“मैं जा रहा हूँ।”

“एक मिनट लगेगा।”

रोहन सीख चुका था कि एक मिनट अनुमान भी हो सकता है, आदेश भी और परीक्षा भी।

उसने घड़ी देखी।

“कह देना, कोई बात हो तो लिखकर भेज दे।”

वह और फराह साथ निकले।

शुरू में नहीं दौड़े। फिर सड़क पार करने का संकेत बदला तो जल्दी चले, क्योंकि घर जाना चाहते थे।

पीछे से किसी ने नाम नहीं पुकारा।

* * *

नौ छत्तीस पर स्टॉप पहुँच गए।

जूस वाला खाली क्रेट जमा कर रहा था।

रोहन के हाथ का पुरस्कार देखा।

“कुछ जीते?”

“हाँ।”

“अच्छा। बस नहीं गई।”

दूसरी खबर लगभग पहली जितनी अच्छी लगी।

बस आई तो साथ की दो सीटें मिल गईं।

फराह खिड़की की तरफ बैठी। रोहन ने ट्रॉफी गोद में इस तरह रखी कि सामने की सीट से न टकराए।

माँ को संदेश भेजा।

आखिरी बस में हूँ। जीत गया।

उत्तर में मेज पर ढकी प्लेट की तस्वीर आई।

कंडक्टर आया। रोहन ने अपना किराया दिया। फिर फराह का देने को कहा।

उसने देने दिया।

रकम को एहसान में बदले बिना भी आगे हिसाब हो सकता था।

बस शहर की सबसे चमकदार सड़कों से बाहर आई तो बधाई संदेश आने लगे। एक विक्रम का था।

हमेशा पता था तुममें क्षमता है।

रोहन ने एक बार पढ़ा और फोन रख दिया।

बगल में फराह की आँखें बंद थीं।

सड़क खराब हुई तो उसने ट्रॉफी सँभाली।

फराह के स्टॉप पर उसे जगाया।

फिर घर की तरफ आगे चला, जहाँ खाना अब भी कुछ गरम था और कोई उससे यह साबित करने को नहीं कहेगा कि अपनेपन की इच्छा कितनी बड़ी है।

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